Wednesday, July 2, 2008

भारतीय किसान की हत्या/आत्महत्या-5

पी सैनाथ के लेख का पांचवा और अन्तिम भाग (आभार- हाशिया)

जब सरकार चुनावी वादों में ठगती है
विदर्भ में होनेवाली 'योग्य' आत्महत्याओं पर वापस लौटते हैं। ऐसा कुछ भी नहीं है, जो महाराष्ट्र सरकार को प्रति क्ंिवटल कपास के लिए 2700 रूपये देने के चुनावी वादे को निभाने से रोकता हो। पर उन्होंने सत्ता में आने के बाद क्या किया? मैं किसी एक सरकार पर अंगुली नहीं उठा रहा हूँ, मैं यह साफ कर दूँ कि पूरे देश में कश्षि की स्थिति काफी बुरी है, सभी सरकारें दोषी हैं। हर सरकार ने वादा खिलाफी की है, कोई भी राज्य बचा नहीं है। लेकिन इस खास मामले में, उन्होंने 2700 रूपये देने का वादा किया था पर इसे घटाकर 500 रूपये कर दिया। उन्होंने तथाकथित 'अग्रिम बोनस' भुगतान के रूप में दी जाने वाली 500 रूपये की योजना भी वापस ले ली।
इस तरह, किसानों से 1200 करोड़ रूपये वापस ले लिये गये। किसानों से 1200 करोड़ वापस लेने के बाद मुख्यमंत्री 1075 करोड़ के पैकेज की घोषणा करते हैं। 1075 करोड़ का पैकेज उन लोगों को दिया जाता है, जिनसे आपने 1200 करोड़ रूपये वापस ले लिये हैं।
अमेरिका-यूरोपीय यूनियन की सब्सिडियों ने कपास की कीमत को धरातल पर ला दिया
ठीक इसी समय अमेरिका और यूरोपियन यूनियन ने अपने कपास उत्पादकों को सब्सिडियों में डुबो दिया था। अमेरिका के कपास उत्पादक छोटे किसान नहीं हैं, वे कॉरपोरेसन की शक्ल में हैं। महाराष्ट्र में कितने कपास उत्पादक हैं? दसियों लाख हैं। अमेरिका में कितने किसान उत्पादक हैं? उनकी संख्या 20000 है। जब हम अपने किसानों से 1200 रूपये वापस लेते हैं, तब अमेरिका अपने कॉरपोरेसन्‌स को कितना दे रहा होता है ? 39 खरब डॉलर के कृषि मूल्य पर अमेरिका अपने कपास उत्पादकों को 47 खबर डॉलर की सब्सिडी देता है। इस सब्सिडी ने निचले स्तर पर अंतर्राष्ट्रीय कपास बाजार को तहस-नहस कर दिया है। न्यूयार्क एकसचेंज में 1994-95 में कपास का मूल्य 90 से 100 सेंट पर बना रहता था, पर सब्सिडी के कारण यह घट कर 40 सेंट तक आ गया और उस दिन से पूरे विश्व में कपास के मूल्य में जबरदस्त कमी आई और भारी हानि के कारण किसानों की आत्महत्याएँ शुरू हुईं।
बुर्किना फासो में हजारों कपास उपजानेवालों ने आत्महत्या की। बुर्किना फासो व माली के राष्ट्रपतियों के न्यूयार्क टाइम्स को एक लेख जुलाई 2003 में लिखा, 'आपकी कृषि सब्सिडियाँ हमारा गला घोंट रही हैं'। हम ऐसी सब्सिडियों के विरुद्ध कोई कदम उठाने की स्थिति में नहीं हैं। कपास पर हमारे यहाँ 10 प्रतिशत ड्यूटी लगती है, लेकिन अगर आप मुंबई के टेक्सटाइल मैग्नेट हैं तो आपको यह 10 प्रतिशत चुकाने की भी जरूरत नहीं है। आपकों कपड़ों के निर्यात के नाम पर यह छूट मिलती है। इत्तेफाक से, अगर मैं मुंबई का एक टेक्सटाइल मैग्नेट हूँ तो मुझे कपास तो लगभग मुफ्त में ही मिल सकता है क्योंकि भारत में कपास काफी कम मूल्य पर बेचने वाले अमेरिकी कॉरपोरेसन 6 महीने के लिए उधार भी देने को तैयार हैं। इन 6 महीनों में मैं कपास से सूती कपड़ा बनाने के पूरे चक्र को पूरा कर सकता हूँ।
इस तरह मैं वास्तव में आपसे एक ब्याज रहित कर्ज प्राप्त कर रहा हूँ जिसे मैं 6 महीने में वापस करता हूँ और तबतक मैं भारी मुनाफा कमा लेता हूँ। यह सारा खेल लाखों लोंगो की जान की कीमत पर खेला जा रहा है।
मीडिया की भूमिका
मेरे लिए सबसे दुखद बात श्रीमती अल्वा की टिप्पणी है। एक पत्रकार के रूप में मैं आपका पूरी तरह समर्थन करता हूँ। पिछले साल हुई सबसे पीड़ादायक बात यह थी कि विदर्भ में आत्महत्याओं की रिपोर्टिंग 6 से भी कम राष्ट्रीय स्तर के पत्रकार कर रहे थे। जबकि लैक्मे इंडिया फैशन वीक को कवर करने के लिए 512 मान्यता प्राप्त पत्रकार आपस में भिड़े हुए थे। इस फैशन वीक कार्यक्रम में मॉडल सूती कपड़ों का प्रदर्शन कर रहे थे, जबकि नागपुर से मात्र डेढ़ घंटे के हवाई-सफर की दूरी पर स्थित विदर्भ क्षेत्र में कपास उपजाने वाले स्त्री-पुरूष आत्महत्याएँ कर रहे थे। इस विरोधाभाष पर एक न्यूज स्टोरी तैयार की जानी चाहिए थी, लेकिन एक या दो स्थानीय पत्रकारों को छोड़ किसी ने ऐसा नहीं किया ।
हमने प्रति क्ंिवटल अग्रिम बोनस के रूप में दी जाने वाली 500 रूपये की योजना तब वापस ली जब अमेरिक व यूरोपीय यूनियन के देश अपनी सब्सिडियाँ बढ़ा रहे थे। मैं पिछले साल अमेरिका गया था और अमेरिकी खेतों का दौरा किया था, साथ ही साथ कॉरपोरेट तरीके से संचालित डेयरियों में भी गया था। प्रति गाय पर दी जाने वाली सब्सिडी हमारे यहाँ राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम के अंतर्गत दी जानेवाली मजदूरी के दोगुनी थी। प्रति गाय 3 डॉलर अर्थात लगभग 120 रूपये की सब्सिडी दी जाती है। यह आपके राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गांरटी कार्यक्रम के मजदूरी दर के दोगुनी है, जो कि 60 रूपये है। इस कारण मेरे दोस्त वर्धा के विजय जावांदिया ने यह बात बड़े ही खूबसूरत तरीक से एक टीवी साक्षात्कार में रखी। उनसे पूछा गया - जावांदिया साहब, एक भारतीय किसान का सपना क्या होता है? उन्होंने कहा कि भारतीय किसान का सपना यह है कि वो अमेरिकी गाय के रूप में पैदा ले क्योंकि उसे हमारे मुकाबले तीन गुना ज्यादा सहायता दी जा रही है। हमने किसानों को वैश्विक मूल्य में मची मार-काट के बीच फंसा दिया है और उनके पास जो भी सुरक्षा थी उसे हटा दिया है। हम अमेरिका-यूरोपीय यूनियन की सब्सिडियों का सामना करने की स्थिति में नहीं हैं।
बीज कंपनियों को ज्यादती करने की छूट दे दी गई है
हमने खेती को इस हद तक अनियमित कर दिया है कि अब बीजों की गुणवत्ता काफी कम हो गई है। इसे ऐसे समझें, जब आपने एक थैला बीज खरीदा तो थैले के पीछे यह लिखा हुआ मिलेगा कि 85 प्रतिशत अंकुरण की गारंटी। अब यह घट कर 60 प्रतिशत हो गया है। इसका मतलब यह है कि अगर कोई गाँव बीज की 10000 थैलियाँ खरीदता है तो वे लोग 10000 थैलियों की कीमत तो चुका रहे हैं लेकिन सिर्फ 6000 थैलियों ही वास्तव में पा रहे हैं। क्योंकि हमने कंपनियों के साथ समझौतापत्र पर हस्ताक्षर कर बीजों का स्तर घटा दिया है। जैसा कि मैंने पहले भी कहा था कि बीज उद्योग सॉटवेयर उद्योग से भी बड़ा है। कश्षि विश्वविद्यालयें विफल साबित हुई हैं। जैसा कि भारत सरकार खुद भी स्वीकार करती है कि एक्सटेंसन मशीनरी पूरी तरह रूग्ण स्थिति में है। जब अग्रिम बोनस योजना सरकार वापस ले रही थी, तब हमने सरकार से गुहार लगाई थी कि कृपया ऐसा न करें क्योंकि इससे आत्महत्याएँ दोगुनी हो जायेंगी। हम गलत थे। कुछ जगहों में यह तिगुनी हो गई। हमने प्रार्थना की थी- ऐसा न करें, ऐसा न करें, इसे वापस न लें, यह वास्तव में उन लोगों की जान लेगा जो काफी असुरक्षित स्थिति में हैं।
विदर्भ बनाम मुंबई
संयोग से महाराष्ट्र में 2005 के अंत में एक अनोखा सरकारी अध्यादेश लाया गया था। मैं नहीं जानता आपको इसके बारे में पता है कि नहीं। महाराष्ट्र में साधरणतः 14 से 15 घंटे तक बिजली क्रटती है, जबकि मुबंई के नामी इलाकों में 1 मिनट के लिए भी पावर कट नहीं होता। सुंदर लोगों को पावर कट के भरोसे कैसे छोड़ा जा सकता है। लेकिन सच्चाई यह है कि मंबई में 15 मिनट का पावर कट विदर्भ के सभी 11 जिलों को 2 घंटे तक बिजली दे सकता है। पर विदर्भ के बच्चों को परीक्षा के समय में भी राहत नहीं मिलती। इसी कारण 12वीं की परीक्षाओं में विदर्भ का प्रदर्शन हमेशा बुरा रहता है, फिर भी टॉपर विदर्भ से ही है। इस तरह अग्रिम बोनस योजना की वापसी के साथ एक नया सरकारी अध्यादेश भी आया। पर पावर कट में भी छूट दी जा रही है। क्या आप जानते हैं कि 2005 नये सरकारी अध्यादेश में क्या छूट दी गई है? पोस्टमॉर्टम केन्द्रों को पावर कट से छूट दी गई थी क्योंकि ढेर सारे शव यहां पोस्टमॉर्टम के लिए लाये जा रहे थे। उन्होंने पोस्टमॉर्टम केन्द्रों के साथ-साथ सुरक्षा बलों, पुलिस स्टेशनों, फायर ब्रिगेड आदि को भी पावर कट में छूट दी।

Tuesday, July 1, 2008

भारतीय किसान की हत्या/आत्महत्या-4

पी सैनाथ के लेख का चौथा भाग (आभार- हाशिया )
खेती से होनेवाली आय ध्वस्त हुई है
आय की ओर देखें। खेती से होनेवाली आय का ध्वस्त होना इस संकट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। कई क्षेत्रों में खेती से होनेवाली आय पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। जैसा कि मैंने पहले बताया भारत के खेतिहर घरों में राष्ट्रीय प्रति व्यक्ति औसत मासिक खर्च 503 रुपये है। यह आँकड़ा गरीबी रेखा के नीचे रहनेवाले परिवारों के 425 रुपये या ग्रामीण भारत के आंकड़ों के काफी करीब हैं। 6 राज्य औसतन गरीबी रेखा के नीचे रहे हैं, जो कि 425 रुपये से कम हैं। 5 या 5 राज्य इस देश में इसी तरह जी रहे हैं।
ऐसे कई घर हैं जो 225 रुपये प्रति व्यक्ति मासिक खर्च पर गुजर-बसर कर रहे हैं। यह आँकड़े राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के हैं। 225 रुपये प्रति मासिक खर्च का मतलब है कि 8 रुपये प्रतिदिन। इतने में ही आपको भोजन, कपड़े, जूते, शिक्षा, स्वास्थ्य व परिवहन की व्यवस्था करनी है। इस तरह के जीवन में फिर क्या बच जाता है ? आप हमेशा कर्ज में रहेंगे। 55 प्रतिशत भोजन पर खर्च होंगे, 18 प्रतिशत जलावन, जूते और कपड़े पर खर्च होंगे। इन सभी क्षेत्रों में आप स्कूल और कॉलेज छोड़नेवालों की बड़ी संख्या पायेंगे। बीएससी डिग्रीधारी स्नातक किसी तरह जिंदगी चलाने के लिए अपने पुश्तैनी खेतों में खेतिहर मजदूर की तरह काम कर रहे हैं, जबकि हमारे कृषि विश्वविद्यालयों ने निजी कंपनियों आदि के लिए शोध करने का काम भर ले रखा है, वे अब हमारे किसानों के लिए अब कोई काम नहीं करते।
ग्रामीण संकट पर उच्च वर्ग की राय
तलछटी में पड़े इन हाने के इस संकट को हमारा उच्च या कुलीन वर्ग किस तरह देखता है ? मुझे अपने देश के एक अग्रणी आर्थिक अखबार को उद्धृत करने की अनुमति दें। इस अखबार की एक प्रतिनिधि थोड़ा निराश होकर लिखती हैं-' तलछटी में पड़े ये 40 करोड़ एक निराशा हैं'' क्यों ? वे ज्यादा खरीददारी नहीं करते। मैं नहीं जानता वे 8 रुपये प्रति व्यक्ति खर्च में क्या खरीद सकते हैं। वो कहती हैं कि वे ज्यादा नहीं खरीदते। लेकिन ऐसा लिखनेवाले की भी जिम्मेवारी है। वो यह इन शब्दों के साथ अपना लेख समाप्त करती हैं, 'इस बाजार का दोहन करना कठिन है'।
विदर्भ का संकट
विदर्भ के बारे में हम क्या कहेगें जहां से पिछले कुछ वर्षो में ढेर सारी आत्महत्याओं की रिर्पोर्टिंग की गई है ? जैसा कि श्रीमती अल्वा ने कहा, जो हम मीडिया के जरिये देख पाते है वह काफी छोटी संख्या है। स्थानीय दर्जनों पत्रकारों ने इस मुद्दे की जीवित रखा है । उन्हें इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए। विदर्भ में कितनी आत्महत्याएंॅ हुई हैं ? क्या उनमें कोई कमी आई ? मीडिया के एक वर्ग के अनुसाार, आत्महत्याएँ रूक गई हैं। वास्तव में सरकार ने समय-समय पर ऐसे कई आँकड़े प्रस्तुत किये हैं, जो काफी विरोधाभाषी हैं। सरकार ने शीर्षस्थ स्तर पर ऐसी किसी रिपोर्ट पर हस्ताक्षर नहीं किया है, जिसमें यह दिखाया गया हो कि आत्महत्याएँ घटी हैं। ऐसा क्यों है ? इस कारण कि ऐसा करने से सरकार गंभीर संकट में फँस जायेगी।
उच्च न्यायालय के नागपुर बेंच ने यह आदेश दिया था कि राज्य सरकार को इस तरह के आँकड़ों की जानकारी एक बेवसाइट के माध्यम से अवश्य देनी चाहिए। न्यायालय ने यह फैसला एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान दिया। अगर आप सरकारी वेबसाईट देखते हैं तो आपको ऐसे किसी रिपोर्ट को पढ़ने की आवश्यकता नही है। वेबसाईट पर दिये गये आँकड़ें इतने झूठे हैं कि ऐसा लगता है कि वो आत्महत्याओं में कमी दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। मुझे अमरावती के आयुक्त की रिपोर्ट से वास्तविक संख्या बताने की इजाजत दें और देखें कि उन्हें किस तरह प्रस्तुत किया गया ।
विदर्भ के इन जिलों में आत्महत्याओं की कुल संख्या, सिर्फ किसानों की आत्महत्याओं की नहीं, 1500 नहीं है । 2001 से, सबसे ज्यादा गंभीर वर्षो में, यह 2000 नहीं थी, यह 1300 नही थी और यह 1700 भी नहीं थी। पुलिस थानों ने इन 6 जिलों में 15980 आत्महत्याएँ दर्ज कीं। यह सभी आत्महत्याएँ किसानों की नहीं थी, यहीं पर वे इन आँकड़ों का मजाक बना देते हैं। वे इन 15980 आत्महत्याओं में से वे मात्र 578 या ऐसे ही किसी आँकड़े के पास पहुँचते हैं, जो किसानों की आत्महत्याओं से संबंधित हैं। उन्होंने ऐसा कैसे किया, वो हम आगे देख सकते हैं। संयोगवश यह सभी 6 जिले पूरी तरह ग्रामीण जिले हैं। लेकिन अंतिम आँकडंे यह दर्शाते हैं कि इन 15000 आत्महत्याओं में मात्र 20 प्रतिशत आत्महत्याएँ ही किसानों ने की थी। ऐसा वो पूरी तरह 100 प्रतिशत ग्रामीण जिलों के बारे में कहते हैं। यह एक रहस्य ही है कि वो आत्महत्याएँ करनेवाले कौन थे या हैं। ये कोई औद्यौगिक जिले नहीं थे, यदि मात्र 2939 व्यक्ति ही इनमें से किसान थे, जो कि 15980 में आँकड़े के 20 प्रतिशत से भी कम है, तो वो बाकी लोग कौन थे ? इससे तो ऐसा लगता है कि किसानों की स्थिति काफी अच्छी थी ! वास्तव में बहुत अच्छी थी ! बाकी सारे लोग आत्महत्या कर रहे थे।
किसी भी राज्य में गरीबी का अब तक का सबसे बड़ा सर्वेक्षण
मैं महाराष्ट्र सरकार को एक बात के लिए पूरा श्रेय देना चाहता हूँ। वो यह कि उसने राज्य में कृषक-घरों का सबसे बड़ा अध्ययन किया। यह एक ऐसा अध्ययन है जिसको पढ़ने के लिए हर व्यक्ति को थोड़ा वक्त निकालना चाहिए। यह अध्ययन आपके नसों में दौड़ते खून को बर्फ सा ठंडा कर देगा। इस सर्वेक्षण के लिए हम प्रधानमंत्री की यात्रा के शुक्रगुजार हैं, जिस कारण हर कोई इसमें लगा। उन्होंने राज्य के सभी 17.64 लाख घरों का सर्वेक्षण किया (लगभग 1 करोड़ लोगों का)। विदर्भ के उन सभी 6 जिलों में कृषि-घरों का सर्वेक्षण किया गया, जिनको सरकार कृषि-संकट के कारण प्रभावित मानती है (वैसे विदर्भ में कुल 11 जिले हैं ) । ये आँकड़े क्या दिखाते हैं ? इस सर्वेक्षण पर ही वो आंकड़े आधारित हैं, जो अमरावती के आयुक्त की रिपोर्ट में प्रस्तुत किये गये हैं (जो दस्तावेज मैंने आपको देने का वादा किया है)। प्रभावित 6 जिलों में से 5 जिले अमरावती के आयुक्त के कार्य-क्षेत्र में आते हैं। लेकिन उन्होंने अपनी रिपोर्ट में ६ वें जिले वर्धा के आँकड़ों को भी शामिल किया है । अमरावती के आयुक्त की रिपोर्ट कहती है कि : ' इन लगभग 20 लाख कृषक घरों (17.64 लाख) में से लगभग 75 प्रतिशत घर गरीबी में हैं। ' अगर आप एक परिवार में कुल 5 से 6 व्यक्ति भी मानें तो यह रिपोर्ट कहता है कि 4.31 लाख घर 'बहुत ही ज्यादा गरीब'' हैं। ऐसा सरकार कहती है। अगला वर्गीकरण 'औसत गरीबी' का है, मैं नही जानता इसका क्या अर्थ है। लेकिन यह रिपोर्ट स्वीकार करता है कि 75 प्रतिशत कृषक घरों में किसी न किसी प्रकार की गरीबी है। ' आश्चर्यजनक रूप से, तीन लाख से ज्यादा परिवारों को अपनी बेटियों के विवाह में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था, जो कि इन आत्महत्याओं का काफी बड़ा कारण है। ये तीन लाख से ज्यादा घर एक या एक से अधिक बेटियों की शादी नहीं कर पा रहे हैं। यह एक विस्फोटक स्थिति है। ' सरकार अपने ही अध्ययन में यह दिखाती है कि जिन घरों का उसने सर्वेक्षण किया, उनमें से 93 प्रतिशत घरों में कर्ज भी आत्महत्या का एक कारण था। ' पैकेज की घोषणा के बाद यह आशा की गई थी कि आतमहत्याओं में कमी होगी। पुलिस थानों के रिकार्ड दिखाते हैं कि 2005 के 2425 के मुकाबले 2006 में यह संख्या बढ़कर 2832 हो गई। 407 ज्यादा मामले दर्ज हुए, जो कि काफी बड़ी वश्द्धि है। ऐसा इस कारण क्योंकि इन 6 जिलों में प्रति जिले के आधार पर गणना करें तो हर जिले में 60 से ज्यादा आत्महत्याएँ और बढ़ गईं। और भी इसी तरह के ढ़ेर सारे आँकड़े हैं। तब वो किस तरह 'कमी' बताते हैं ? मैं तो सोचता हूँ कि इसके पीछे कोई चतुर राष्ट्रवादी भारतीय मस्तिष्क है। पहली श्रेणी में पुलिस थानों के रिकॉर्ड कहते हेैं कि पिछले साल 2832 आत्महत्याएँ हुइर्ं। रिपोर्ट का दूसरा कॉलम हमें इन 2832 आत्महत्याओं में किसानों की आत्महत्याओं का ऑकड़ा देता है और यह संख्या लगभग 800 घट जाती है । तीसरा कॉलम हमें किसानों के रिश्तेदारों की आत्महत्याओं से संबंधित ऑकड़ें देता है, जो कि किसान नहीं हैं। तब यह संख्या घटकर 1600 हो जाती है। और इस तरह किसानों की आत्महत्याओं को कृषक घरों में होने वाली आत्महत्याओं से अलग बताया जाता है। तब 'छानबीन हो रहे मामलों'' की बारी आती है। इसके अलावे एक अन्य टेबल में उन आत्महत्याओं की सूची है, जो 'गरीबी'' के कारण हुईं। हर कालम के साथ यह संख्या घटती जाती है। अंतिम कॉलम तो अपने आप में अदभुत है। ऐसा आपको इस पृथ्वी पर कहीं और देखने को नहीं मिलेगा। इसमें 'योग्य आत्महत्याओं'' का एक कॉलम है, योग्य वर या वधू की तरह। इसका मतलब उन आत्महत्याओं से है, जिन परिवारों को सरकार ने मुआवजे के योग्य पाया है। इस तरह 2823 से घटकर यह ऑकड़ा अंतिम कॉलम में घटकर 578 रह जाता है। यह 'योग्य' आत्महत्याओं की वही संख्या है, जिनको अधिकारी आत्महत्या के आँकड़े के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इस महीने (अगस्त का महीना अभी समाप्त ही हुआ है) हमारे पास अब तक आत्महत्याओं के बारे में कोई सूचना नहीं है, क्योंकि अगर आप हमारे गणितज्ञों को आगे बढ़ने का मौका दें तो वे आत्महत्याओं की बिल्कुल एक नई ही परिभाषा गढ़ देंगे। लेकिन समग्र रूप से यह संख्या बढ़ती ही जा रही है। आप यह देख सकते है। इस साल जबकि कोई आत्महत्या नहीं हुई या आत्महत्याओं में काफी तीव्र कमी हुई है, महाराष्ट्र सरकार के अनुसार 700 से ज्यादा आत्महत्याएँ हो चुकी हैं। सरकार इन ऑकड़ों को स्वीकार क्यों नहीं करती ? यह इस कारण क्योंकि यह बेवसाइट न्यायालय के आदेश के अधीन चलाया जा रहा है और ऐसी स्थिति में अगर आपके ऑंकड़े विरोधाभाषी होंगे तो आप गंभीर संकट में पड़ सकते हैं। पर हम इन आँकड़ों के साथ हमेशा खेल सकते हैं।